विधायक भी अपना रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत करें खुले दरबार में
पांच साल में एक बार मतदाता के दरवाजे खटखटाने वाला प्रत्याशी जीतने के बाद या हारने के बाद पलट के नहीं देखता। वो आता भी है तो इस उम्मीद से कि उसे माला पहनाई जाई,उसके गुणगान किए जाए,उसके आगे समस्याओं का ढेर लगाया जाए और वो आश्वासन की मृगकस्तुरी पकडा कर बढ ले।
मेरे ख्याल से अब इसमें परिवर्तन की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने निसंदेह मंत्रियों और अधिकारियों पर जवाबदेही का शिकंजा तो कसा है। इसलिए सालों—साल सरकार में रहने के बाद मध्यप्रदेश के मंत्रीगण अपना साल भर का रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत कर रहे हैं। हांलाकि यह सिर्फ आंकडों की बाजीगारी के अलावा कुछ नहीं है और एक भी तीखा सवाल उनके जायका खराब कर देता है। लेकिन फिर भी अच्छी शुरूआत की प्रशंसा निर्विकार रूप से करनी चाहिए।
अब मेरी और विशेषकर एक मतदाता होने के नाते एक मांग है कि हर विधायक को एक साल में अपने मुख्यालय में एक खुला दरबार लगाकर अपने कामों का हिसाब देना चाहिए। इसमें शहर के गणमान्य नागरिक हों,पत्रकार हों ,प्रशासन के अधिकारी—कर्मचारी हों।
इसके साथ ही आगे आने वाले एक साल में वो क्या करेंगे ,इसका भी ब्यौरा देना चाहिए।
देश के कानून में प्रावधान है कि यदि छोटी कंपनी भी है तो उसे अपनी कंपनी के हर तिमाही पर हिसाब देना होता है। हर निवेशक को इसकी लिखित सूचना दी जाती है और नतीजे विज्ञापित किए जाते हैं।
कानून में लोक सेवक कहे जाने वाले साहब आज भी अपने मालिक यानी जनता के मालिक होने का अहसास कराते हैं। आखिर इनसे हिसाब क्यों न मांगा जाए? जनाब हिसाब तो देना ही होगा।
पांच साल में एक बार मतदाता के दरवाजे खटखटाने वाला प्रत्याशी जीतने के बाद या हारने के बाद पलट के नहीं देखता। वो आता भी है तो इस उम्मीद से कि उसे माला पहनाई जाई,उसके गुणगान किए जाए,उसके आगे समस्याओं का ढेर लगाया जाए और वो आश्वासन की मृगकस्तुरी पकडा कर बढ ले।
मेरे ख्याल से अब इसमें परिवर्तन की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने निसंदेह मंत्रियों और अधिकारियों पर जवाबदेही का शिकंजा तो कसा है। इसलिए सालों—साल सरकार में रहने के बाद मध्यप्रदेश के मंत्रीगण अपना साल भर का रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत कर रहे हैं। हांलाकि यह सिर्फ आंकडों की बाजीगारी के अलावा कुछ नहीं है और एक भी तीखा सवाल उनके जायका खराब कर देता है। लेकिन फिर भी अच्छी शुरूआत की प्रशंसा निर्विकार रूप से करनी चाहिए।
अब मेरी और विशेषकर एक मतदाता होने के नाते एक मांग है कि हर विधायक को एक साल में अपने मुख्यालय में एक खुला दरबार लगाकर अपने कामों का हिसाब देना चाहिए। इसमें शहर के गणमान्य नागरिक हों,पत्रकार हों ,प्रशासन के अधिकारी—कर्मचारी हों।
इसके साथ ही आगे आने वाले एक साल में वो क्या करेंगे ,इसका भी ब्यौरा देना चाहिए।
देश के कानून में प्रावधान है कि यदि छोटी कंपनी भी है तो उसे अपनी कंपनी के हर तिमाही पर हिसाब देना होता है। हर निवेशक को इसकी लिखित सूचना दी जाती है और नतीजे विज्ञापित किए जाते हैं।
कानून में लोक सेवक कहे जाने वाले साहब आज भी अपने मालिक यानी जनता के मालिक होने का अहसास कराते हैं। आखिर इनसे हिसाब क्यों न मांगा जाए? जनाब हिसाब तो देना ही होगा।

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