प्रिय साथियों
बहुत समय से लेखन से दूर रहा। कुछ सामाजिक गतिविधियों में इस तरह उलझा रहा कि लिखने का समय कम ही मिल पाया। पहले सोचता था और कुछ कमेंटस भी करते थे कि लिखना और आलोचना करना आसान है,कुछ करके दिखाओ तो कुछ सार्थक करने की कोशिश की। लेकिन अब सोचता हूं कि करने के साथ—साथ अपने मूल धर्म लेखन को परे रखना गलत है। आखिर लेखन ही तो मेरी आत्मा है और पाठक ही परमात्मा है। इसलिए अब खूब लिखुंगा,जो करूंगा दिन भर वो लिखुंगा,जो सोचूंगा दिन भर वो लिखुंगा। लेकिन अब आपको निराश नहीं होने दूंगा।
धन्यवाद
बहुत समय से लेखन से दूर रहा। कुछ सामाजिक गतिविधियों में इस तरह उलझा रहा कि लिखने का समय कम ही मिल पाया। पहले सोचता था और कुछ कमेंटस भी करते थे कि लिखना और आलोचना करना आसान है,कुछ करके दिखाओ तो कुछ सार्थक करने की कोशिश की। लेकिन अब सोचता हूं कि करने के साथ—साथ अपने मूल धर्म लेखन को परे रखना गलत है। आखिर लेखन ही तो मेरी आत्मा है और पाठक ही परमात्मा है। इसलिए अब खूब लिखुंगा,जो करूंगा दिन भर वो लिखुंगा,जो सोचूंगा दिन भर वो लिखुंगा। लेकिन अब आपको निराश नहीं होने दूंगा।
धन्यवाद

No comments:
Post a Comment