Tuesday, December 23, 2014

आओ जाने हम भारत रत्न महामना मदनमोहन मालवीय को


महामना मदन मोहन मालवीय (25 दिसम्बर 1861 - 1946) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रणेता तो थे ही इस युग के आदर्श पुरुष भी थे। वे भारत के पहले और अन्तिम व्यक्ति थे जिन्हें महामना की सम्मानजनक उपाधि से विभूषित किया गया। पत्रकारिता, वकालत, समाज सुधार, मातृ भाषा तथा भारतमाता की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वाले इस महामानव ने जिस विश्वविद्यालय की स्थापना की उसमें उनकी परिकल्पना ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षित करके देश सेवा के लिये तैयार करने की थी जो देश का मस्तक गौरव से ऊँचा कर सकें। मालवीयजी सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, देशभक्ति तथा आत्मत्याग में अद्वितीय थे। इन समस्त आचरणों पर वे केवल उपदेश ही नहीं दिया करते थे अपितु स्वयं उनका पालन भी किया करते थे। वे अपने व्यवहार में सदैव मृदुभाषी रहे। कर्म ही उनका जीवन था। अनेकों संस्थाओं के जनक एवं सफल संचालक के रूप में उनकी अपनी विधि व्यवस्था का सुचारु सम्पादन करते हुए उन्होंने कभी भी रोष अथवा कड़ी भाषा का प्रयोग नहीं किया।
   मालवीयजी का जन्म प्रयाग में, जिसे स्वतन्त्र भारत में इलाहाबाद कहा जाता है, 25 दिसम्बर 1861 को पं० ब्रजनाथ व मूनादेवी के यहाँ हुआ था। वे अपने माता-पिता से उत्पन्न कुल सात भाई बहनों में पाँचवें पुत्र थे। मध्य के मालवा प्रान्त से प्रयाग आ बसे उनके पूर्वज मालवीय कहलाते थे। आगे चलकर यही जातिसूचक नाम उन्होंने भी अपना लिया। उनके पिता पण्डित ब्रजनाथजी संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड विद्वान थे। वे श्रीमद्भागवत की कथा सुनाकर अपनी आजीविका अर्जित करते थे।
   पाँच वर्ष की आयु में उन्हें उनके माँ-बाप ने संस्कृत भाषा में प्रारम्भिक शिक्षा लेने हेतु पण्डित हरदेव धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला में भर्ती करा दिया जहाँ से उन्होंने प्राइमरी परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके पश्चात वे एक अन्य विद्यालय में भेज दिये गये जिसे प्रयाग की विद्या वर्धिनी सभा संचालित करती थी। यहाँ से शिक्षा पूर्ण कर वे इलाहाबाद के ज़िला स्कूल पढने गये। यहीं उन्होंने मकरंद के उपनाम से कवितायें लिखनी प्रारम्भ कीं। उनकी कवितायें पत्र-पत्रिकाओं में खूब छपती थीं। लोगबाग उन्हें चाव से पढते थे। 1879 में उन्होंने म्योर सेण्ट्रल कॉलेज से, जो आजकल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, मैट्रीकुलेशन (दसवीं की परीक्षा) उत्तीर्ण की। हैरिसन स्कूल के प्रिन्सिपल ने उन्हें छात्रवृत्ति देकर कलकत्ता विश्वविद्यालय भेजा जहाँ से उन्होंने 1884 ई० में बी०ए० की उपाधि प्राप्त की।

मालवीय जी ने प्रयाग की धर्म ज्ञानोपदेश तथा विद्याधर्म प्रवर्द्धिनी पाठशालाओं में संस्कृत का अध्ययन समाप्त करने के पश्चात् म्योर सेंट्रल कालेज से 1884 ई० में कलकत्ता विश्वविद्यालय की बी० ए० की उपाधि ली। इस बीच अखाड़े में व्यायाम और सितार पर शास्त्रीय संगीत की शिक्षा वे बराबर देते रहे। उनका व्यायाम करने का नियम इतना अद्भुत था कि साठ वर्ष की अवस्था तक वे नियमित व्यायाम करते ही रहे।

सात वर्ष के मदनमोहन को धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला के देवकीनन्दन मालवीय माघ मेले में ले जाकर मूढ़े पर खड़ा करके व्याख्यान दिलवाते थे। शायद इसका ही परिणाम था कि कांग्रेस के द्वितीय अधिवेशन में अंग्रेजी के प्रथम भाषण से ही प्रतिनिधियों को मन्त्रमुग्ध कर देने वाले मृदुभाषी (सिलवर टंग्ड) मालवीयजी उस समय विद्यमान भारत देश के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी के व्याख्यान वाचस्पतियों में इतने अधिक प्रसिद्ध हुए। हिन्दू धर्मोपदेश, मन्त्रदीक्षा और सनातन धर्म प्रदीप ग्रथों में उनके धार्मिक विचार अज भी उपलब्ध हैं जो परतन्त्र भारत देश की विभिन्न समस्याओं पर बड़ी कौंसिल से लेकर असंख्य सभा सम्मेलनों में दिये गये हजारों व्याख्यानों के रूप में भावी पीढ़ियों के उपयोगार्थ प्रेरणा और ज्ञान के अमित भण्डार हैं। उनके बड़ी कौंसिल में रौलट बिल के विरोध में निरन्तर साढ़े चार घण्टे और अपराध निर्मोचन (अंग्रेजी: Indemnity) बिल पर पाँच घण्टे के भाषण निर्भयता और गम्भीरतापूर्ण दीर्घवक्तृता के लिये आज भी स्मरणीय हैं। उनके उद्घरणों में ह्दय को स्पर्श करके रुला देने की क्षमता थी, परन्तु वे अविवेकपूर्ण कार्य के लिये श्रोताओं को कभी उकसाते नहीं थे।

म्योर कालेज के मानसगुरु महामहोपाध्याय पं० आदित्यराम भट्टाचार्य के साथ 1880 ई० में स्थापित हिन्दू समाज में मालवीयजी भाग ले ही रहे थे कि उन्हीं दिनों प्रयाग में वाइसराय लार्ड रिपन का आगमन हुआ। रिपन जो स्थानीय स्वायत्त शासन स्थापित करने के कारण भारतवासियों में जितने लोकप्रिय थे उतने ही अंग्रेजों के कोपभाजन भी। इसी कारण प्रिसिपल हैरिसन के कहने पर उनका स्वागत संगठित करके मालवीयजी ने प्रयाग वासियों के ह्दय में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया।

कालाकाँकर के देशभक्त राजा रामपाल सिंह के अनुरोध पर मालवीयजी ने उनके हिन्दी अंग्रेजी समाचार पत्र हिन्दुस्तान का 1887 से सम्पादन करके दो ढाई साल तक जनता को जगाया। उन्होंने कांग्रेस के ही एक अन्य नेता पं0 अयोध्यानाथ का उनके इण्डियन ओपीनियन के सम्पादन में भी हाथ बँटाया और 1907 ई0 में साप्ताहिक अभ्युदय को निकालकर कुछ समय तक उसे भी सम्पादित किया। यही नहीं सरकार समर्थक समाचार पत्र पायोनियर के समकक्ष 1909 में दैनिक लीडर अखबार निकालकर लोकमत निर्माण का महान कार्य सम्पन्न किया तथा दूसरे वर्ष मर्यादा पत्रिका भी प्रकाशित की। इसके बाद उन्होंने 1924 ई0 में दिल्ली आकर हिन्दुस्तान टाइम्स को सुव्यवस्थित किया तथा सनातन धर्म को गति प्रदान करने हेतु लाहौर से विश्वबन्द्य जैसे अग्रणी पत्र को प्रकाशित करवाया।

हिन्दी के उत्थान में मालवीय जी की भूमिका ऐतिहासिक है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के नेतृत्व में हिन्दी गद्य के निर्माण में संलग्न मनीषियों में 'मकरंद' तथा 'झक्कड़सिंह' के उपनाम से विद्यार्थी जीवन में रसात्मक काव्य रचना के लिये ख्यातिलब्ध मालवीयजी ने देवनागरी लिपि और हिन्दी भाषा को पश्चिमोत्तर प्रदेश व अवध के गवर्नर सर एंटोनी मैकडोनेल के सम्मुख 1898 ई0 में विविध प्रमाण प्रस्तुत करके कचहरियों में प्रवेश दिलाया। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन (काशी-1910) के अध्यक्षीय अभिभाषण में हिन्दी के स्वरूप निरूपण में उन्होंने कहा कि "उसे फारसी अरबी के बड़े बड़े शब्दों से लादना जैसे बुरा है, वैसे ही अकारण संस्कृत शब्दों से गूँथना भी अच्छा नहीं और भविष्यवाणी की कि एक दिन यही भाषा राष्ट्रभाषा होगी।" सम्मेलन के एक अन्य वार्षिक अधिवेशन (बम्बई-1919) के सभापति पद से उन्होंने हिन्दी उर्दू के प्रश्न को, धर्म का नहीं अपितु राष्ट्रीयता का प्रश्न बतलाते हुए उद्घोष किया कि साहित्य और देश की उन्नति अपने देश की भाषा द्वारा ही हो सकती है। समस्त देश की प्रान्तीय भाषाओं के विकास के साथ-साथ हिन्दी को अपनाने के आग्रह के साथ यह भविष्यवाणी भी की कि कोई दिन ऐसा भी आयेगा कि जिस भाँति अंग्रेजी विश्वभाषा हो रही है उसी भाँति हिन्दी का भी सर्वत्र प्रचार होगा। इस प्रकार उन्होंने हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय रूप का लक्ष्य भी दिया।

कांग्रेस के निर्माताओं में विख्यात मालवीयजी ने उसके द्वितीय अधिवेशन (कलकत्ता-1886) से लेकर अपनी अन्तिम साँस तक स्वराज्य के लिये कठोर तप किया। उसके प्रथम उत्थान में नरम और गरम दलों के बीच की कड़ी मालवीयजी ही थे जो गान्धी-युग की कांग्रेस में हिन्दू मुसलमानों एवं उसके विभिन्न मतों में सामंजस्य स्थापित करने में प्रयत्नशील रहे। एनी बेसेंट ने ठीक कहा था कि"मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि विभिन्न मतों के बीच, केवल मालवीयजी भारतीय एकता की मूर्ति बने खड़े हुए हैं।" असहयोग आन्दोलन के आरम्भ तक नरम दल के नेताओं के कांग्रेस को छोड़ देने पर मालवीयजी उसमें डटे रहे और कांग्रेस ने उन्हें चार बार सभापति निर्वाचित करके सम्मानित किया। लाहौर (1909 में), दिल्ली (1918 और 1931 में) तथा कलकत्ता (1933 में)। यद्यपि अन्तिम दोनों बार वे सत्याग्रह के कारण पहले ही गिरफ्तार कर लिये गये। स्वतन्त्रता के लिये उनकी तड़प और प्रयासों के परिचायक फैजपुर कांग्रेस (1936) में राष्ट्रीय सरकार और चुनाव प्रस्ताव के समर्थन में मालवीयजी के ये शब्द स्मरणीय हैं कि मैं पचास वर्ष से कांग्रेस के साथ हूँ। सम्भव है मैं बहुत दिन न जियूँ और अपने जी में यह कसक लेकर मरूँ कि भारत अब भी पराधीन है। किंतु फिर भी मैं यह आशा करता हूँ कि मैं इस भारत को स्वतन्त्र देख सकूँगा।

असहयोग आंदोलन के चतुर्सूत्री कार्यक्रम में शिक्षा संस्थाओं के बहिष्कार का मालवीयजी ने खुलकर विरोध किया जिसके कारण उनके व्यक्तित्व के प्रभाव से हिन्दू विश्वविद्यालय पर उसका अधिक प्रभाव नहीं पड़ा। 1921 ई0 में कांग्रेस के नेताओं तथा स्वयंसेवकों से जेल भर जाने पर किंकर्तव्यविमूढ़ वाइसराय लॉर्ड रीडिंग को प्रान्तों में स्वशासन देकर गान्धीजी से सन्धि कर लेने को मालवीयजी ने भी सहमत कर लिया था परन्तु 4 फ़रवरी 1922 के चौरीचौरा काण्ड ने इतिहास को पलट दिया; गान्धीजी ने बारदौली की कार्यकारिणी में बिना किसी से परामर्श किये सत्याग्रह को अचानक रोक दिया। इससे कांग्रेस जनों में असन्तोष फैल गया और यह खुसुरपुसुर होने लगी कि बड़ा भाई के कहने में आकर गान्धीजी ने यह भयंकर भूल की है। गान्धीजी स्वयं भी पाँच साल के लिये जेल भेज दिये गये। इसके परिणामस्वरूप चिलचिलाती धूप में इकसठ वर्ष के बूढ़े मालवीय ने पेशावर से डिब्रूगढ़ तक तूफानी दौरा करके राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखा। इस भ्रमण में उन्होंने बहुत बार कुख्यात धारा 144 का उल्लंघन भी किया जिसे सरकार खून का घूँट समझकर पी गयी। परन्तु 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में उसी ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बम्बई में गिरफ्तार कर लिया जिस पर श्रीयुत् भगवान दास (भारतरत्न) ने कहा था कि मालवीयजी का पकड़ा जाना राष्ट्रीय यज्ञ की पूर्णाहुति समझी जानी चाहिये। उसी साल दिल्ली में अवैध घोषित कार्यसमिति की बैठक में मालवीयजी को पुन: बन्दी बनाकर नैनी जेल भेज दिया गया। यह उनकी जीवनचर्या तथा वृद्धावस्था के कारण यथार्थ में एक प्रकार की तपस्या थी। परन्तु सैद्धान्तिक मतभेद के कारण हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रिंस ऑव वेल्स का स्वागत और कांग्रेस स्वराज्य पार्टी के समकक्ष कांग्रेस स्वतंत्र दल व रैमजे मैकडॉनल्ड के साम्प्रदायिक निर्णय पर, जिसकी स्वीकृति को मालवीयजी ने राष्ट्रीय आत्महत्या माना। इस प्रकार कांग्रेस की अस्वीकार नीति के कारण निर्णय विरोधी सम्मेलन और राष्ट्रीय कांग्रेस दल का पुन: संगठन करने जैसे उनके कांग्रेस विरोध के उदाहरण भी इतिहास उल्लेखनीय हैं।

धर्म संस्कृति रक्षा
सनातन धर्म व हिन्दू संस्कृति की रक्षा और संवर्धन में मालवीयजी का योगदान अनन्य है। जनबल तथा मनोबल में नित्यश: क्षयशील हिन्दू जाति को विनाश से बचाने के लिये उन्होंने हिन्दू संगठन का शक्तिशाली आन्दोलन चलाया और स्वयं अनुदार सहधर्मियों के तीव्र प्रतिवाद झेलते हुए भी कलकत्ता, काशी, प्रयाग और नासिक में भंगियों को धर्मोपदेश और मन्त्रदीक्षा दी। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रनेता मालवीयजी ने, जैसा स्वयं पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, अपने नेतृत्वकाल में हिन्दू महासभा को राजनीतिक प्रतिक्रियावादिता से मुक्त रखा और अनेक बार धर्मो के सहअस्तित्व में अपनी आस्था को अभिव्यक्त किया।

प्रयाग के भारती भवन पुस्तकालय, मैकडोनेल यूनिवर्सिटी हिन्दू छात्रालय और मिण्टो पार्क के जन्मदाता, बाढ़, भूकम्प, सांप्रदायिक दंगों व मार्शल ला से त्रस्त दु:खियों के आँसू पोंछने वाले मालवीयजी को ऋषिकुल हरिद्वार, गोरक्षा और आयुर्वेद सम्मेलन तथा सेवा समिति, ब्वॉय स्काउट तथा अन्य कई संस्थाओं को स्थापित अथवा प्रोत्साहित करने का श्रेय प्राप्त हुआ, किन्तु उनका अक्षय-र्कीति-स्तम्भ तो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ही है जिसमें उनकी विशाल बुद्धि, संकल्प, देशप्रेम, क्रियाशक्ति तथा तप और त्याग साक्षात् मूर्तिमान हैं। विश्वविद्यालय के उद्देश्यों में हिन्दू समाज और संसार के हित के लिये भारत की प्राचीन सभ्यता और महत्ता की रक्षा, संस्कृत विद्या के विकास एवं पाश्चात्य विज्ञान के साथ भारत की विविध विद्याओं और कलाओं की शिक्षा को प्राथमिकता दी गयी। उसके विशाल तथा भव्य भवनों एवं विश्वनाथ मन्दिर में भारतीय स्थापत्य कला के अलंकरण भी मालवीय जी के आदर्श के ही प्रतिफल हैं।

Monday, December 15, 2014

विधायक भी अपना रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत करें खुले दरबार में
पांच साल में एक बार मतदाता के दरवाजे खटखटाने वाला प्रत्याशी ​जीतने के बाद या हारने के बाद पलट के नहीं देखता। वो आता भी है तो इस उम्मीद से कि उसे माला पहनाई जाई,उसके गुणगान किए जाए,उसके आगे समस्याओं का ढेर लगाया जाए और वो आश्वासन की मृगकस्तुरी पकडा कर बढ ले।
मेरे ख्याल से अब इसमें परिवर्तन की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने निसंदेह मंत्रियों और अधिकारियों पर जवाबदेही का शिकंजा तो कसा है। इसलिए सालों—साल सरकार में रहने के बाद मध्यप्रदेश के मंत्रीगण अपना साल भर का रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत कर रहे हैं। हांलाकि यह सिर्फ आंकडों की बाजीगारी के अलावा कुछ नहीं है और एक भी तीखा सवाल उनके जायका खराब कर देता है। लेकिन फिर भी अच्छी शुरूआत की प्रशंसा निर्विकार रूप से करनी चाहिए।
अब मेरी और विशेषकर एक मतदाता होने के नाते एक मांग है कि हर विधायक को एक साल में अपने मुख्यालय में एक खुला दरबार लगाकर अपने कामों का हिसाब देना चाहिए। इसमें शहर के गणमान्य नागरिक हों,पत्रकार हों ,प्रशासन के अधिकारी—कर्मचारी हों।
इसके साथ ही आगे आने वाले एक साल में वो क्या करेंगे ,इसका भी ब्यौरा देना चाहिए।

देश के कानून में प्रावधान है कि यदि छोटी कंपनी भी है तो उसे अपनी कंपनी के हर तिमाही पर हिसाब देना होता है। हर निवेशक को इसकी लिखित सूचना दी जाती है और नतीजे विज्ञापित किए जाते हैं।
कानून में लोक सेवक कहे जाने वाले साहब आज भी अपने मालिक यानी जनता के मालिक होने का अहसास कराते हैं। आखिर इनसे हिसाब क्यों न मांगा जाए?  जनाब हिसाब तो देना ही होगा। 

Thursday, December 11, 2014

अरुणिमा: आत्मविश्वास का अरुणोदय

आत्मविश्वास की इंतहा बनाम अरूणिमा सिन्हा

अरुणिमा उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर की निवासी हैं और केंद्रीय अद्योगिक सुरक्षा बल (सी आई एस एफ) में हेड कांस्टेबल के पद पर 2012 से कार्यरत हैं।
12 अप्रैल 2011—
को लखनऊ से दिल्ली जाते समय उसके बैग और सोने की चेन खींचने के प्रयास में कुछ अपराधियों ने बरेली के निकट पदमवाती एक्सप्रेस से अरुणिमा को बाहर फेंक दिया था, जिसके कारण वह अपना पैर गंवा बैठी थी। वह एक चलती हुई ट्रेन से टकराईं और बुरी तरह घायल हो गईं थीं। इलाज के दौरान डाक्टरों ने उसकी जान बचाने के लिए उसका बायां पांव काट दिया गया था। डॉक्टरों का जोर इसी पर था कि उनकी कटी हुई टांग में इन्फेक्शन न फैले और घाव जल्द से जल्द भर जाएं। उन्हें नकली पैर लगाना पड़ा था। अरुणिमा की रीढ़ की हड्डी में भी तीन फैक्चर पाए गए थे। उनके दाएं पैर की भी दो हड्डियां टूटी हैं जिन्हें ठीक करने के लिए कुछ दिन बाद ऑपरेशन किया जाए। अपराधियों द्वारा चलती ट्रेन से फेंक दिए जाने के कारण एक पैर गंवा चुकने के बावजूद अरूणिमा ने गजब के जीवट का परिचय देते हुए
21 मई 2013—
को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (29028 फुट) को फतह कर एक नया इतिहास रचते हुए ऐसा करने वाली पहली विकलांग भारतीय महिला होने का रिकार्ड अपने नाम कर लिया। ट्रेन दुर्घटना से पूर्व उन्होने कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में राज्य की वॉलीबाल और फुटबॉल टीमों में प्रतिनिधित्व किया है।

अरूणिमा की कहानी:
खुद उनकी जुबानी

हिमालय की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर विजय पताका फहराने वाली अरुणिमा सिन्हा जुनून को एवरेस्ट से भी बड़ा मनती हैं। उनका जुनून ही है, जिसने बायां पैर न रहते हुए भी उन्हें एवरेस्ट की ऊंचाई छूने में कामयाबी दिलाई। पेश है, उनकी बहादुरी और कामयाबी की दास्तान उन्हीं की जुबानी -:

"मैं सफलता के आसमान पर हूं, एवरेस्ट के ऊपर हूं। मैं जो चाहती थी वह मैंने पाया है। मेरे पैरों ने भी मेरा पूरा साथ दिया। क्या हुआ जो मेरे पास मेरा अपना बायां पैर नहीं है..पराए पैर ने पराएपन का अहसास तक नहीं होने दिया..एक पैर क्या, मेरे पास और भी कुछ न होता तब भी मैं यहीं पर होती। ऊंचाई ही मुझे पुकारती है, मेरे बुलंद इरादों को कोई छू भी नहीं सकता, मुझे कोई रोक भी नहीं सकता।

मैं वॉलीबॉल-फुटबॉल खेलना चाहती थी, हॉकी चैंपियन बनना चाहती थी, लेकिन मेरी कटी हुई टांग ने मुझे नियम-कानून से बंधे खेलों में जाने से रोक दिया। लोग कहते हैं कि कानून पैरों में बंधी हुई बेड़ियों के समान होते हैं, मेरे पास तो एक पैर भी नहीं था, लेकिन पर्वत पर चढ़ने से मुझे कौन रोक सकता था।

जब मैंने पहली बार एवरेस्ट फतह करने की अपने दिल की इच्छा जताई थी तो लोगों ने कैसा मजाक उड़ाया था। आज वे ही लोग देख लें कि मैं कहां पर हूं.. अरे, पैरों से चलकर मंजिल मिलती होती तो अरबों लोग अपनी मंजिलों पर पहुंच गए होते, यह तो हौसला होता है जो आपको कहीं भी पंहुचा देता है। जैसे मैं आज यहां पर हूं श्वेत बर्फ से ढकी पहाड़ियों और स्वच्छ नीले आकाश के नीचे, जय बजरंगबली..!

नाम मेरा है अरुणिमा सिन्हा। मुझे लोग सोनू भी कहते हैं। मैं बहुत प्रसिद्ध नहीं हूं लेकिन दो साल पहले मेरे साथ जो हादसा हुआ था, उससे मुझे पहचान मिली। वह पहचान कोई नेकनामी वाली नहीं थी और न ही मैंने कोई अच्छा काम किया था। वह बदनामी थी। मगर मेरी क्या गलती थी?

मैं उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले के क्षेत्राना (शाजादपुर) मोहल्ले की हूं। सच तो यह है कि हम लोग मूलत: बिहार के हैं। पिता फौज में थे और हम लोग सुल्तानपुर आ गए थे। लेकिन जब मैं चार साल की थी, तभी मेरे पिताजी का स्वर्गवास हो गया। मेरा एक छोटा भाई है और बड़ी बहन लक्ष्मी। आप समझ सकते हैं कि बिना पिता के परिवार की क्या हालत होती है।

मेरी मां अंबेडकरनगर आ गईं और स्वास्थ्य विभाग में उन्हें नौकरी मिल गई। किसी तरह जीवन की गाड़ी आगे बढ़ने लगी। मुझे भी पढ़ाई के लिए स्कूल भेजा गया लेकिन मेरा खेलने में ज्यादा मन लगता था। हमारे समाज में लड़कियों को घर के काम में निपुण करने की परंपरा है, खेलने वाली लड़कियां कम ही दिखाई पड़ती हैं। लोगों ने मना भी किया लेकिन मैं कहां मानने वाली थी। मेरी मां भी मुझे नहीं टोकती थी और मेरी मां जैसी दीदी लक्ष्मी तो जैसे मेरे पीछे दीवार बनकर खड़ी रहती थीं।

मैंने फुटबॉल, वॉलीबॉल और हॉकी खेली। हॉकी खेलने के लिए स्टिक लेकर जब निकलती थी तो मोहल्ले के लड़के कहां बाज आने वाले। वे मेरी खिल्ली उड़ाते थे। कहते थे, देखो जा रही है झांसी की रानी बनकर खेलने, बड़ी आई स्टिक लेकर चलने वाली। मैं वैसे तो लड़कों की परवाह भी नहीं करती थी, लेकिन जब बात अखरने वाली लगती थी तो मैं घूरकर उनकी तरफ देखती थी, तो वे उड़न-छू हो जाते थे।

मुझे याद है कि एक बार जब मैं 14 बरस की रही होऊंगी और साइकिल से हम दोनों बहनें कहीं जा रहे थे तो एक जगह पर लक्ष्मी दीदी रुककर किसी से बात करने लगीं और मैं थोड़ा आगे निकलकर वहां पर उनका इंतजार करने लगी। उस दौरान कुछ लड़के साइकिल से उधर से गुजरे तो मुझसे रास्ता छोड़ने को कहा। मैंने मना कर दिया और कहा कि आगे जगह है, उधर से निकल जाओ।

वे अपनी बात पर अड़े रहे और मैं अपनी बात पर। इस बीच जब लक्ष्मी दीदी आ गईं और हम चलने लगे तो किसी लड़के ने झापड़ मारा जो मेरी दीदी के गाल पर लग गया। भीड़ का लाभ उठाकर लड़के भाग गए। दीदी के गाल पर चांटा देखकर मुझे बहुत क्रोध आया। मैंने दीदी से कहा कि चलो उस लड़के को ढूंढ़कर सबक सिखाते हैं। दीदी ने मना किया लेकिन मेरे ऊपर तो जैसे चंडी सवार थी। हम दोनों उन लड़कों को काफी देर तक तलाशते रहे और घूम-फिर कर उसी जगह आ गए। वहां पर पान की दुकान पर खड़े एक लड़के की शर्ट का कालर देखकर दीदी ने कहा कि यही वह लड़का है। बस फिर क्या था, मैंने दौड़कर उस लड़के को दबोच लिया और दीदी से कहा, "मार दीदी, छोड़ना नहीं।"

भीड़ लग गई, काफी बवाल हुआ लेकिन मैंने छोड़ा नहीं। अंत में उस लड़के के घर वाले आए और माफी मांगी तब जाकर मैंने उसे छोड़ा। उसके बाद फिर किसी ने मेरी तरफ या मेरी दीदी की तरफ नजर उठाकर भी नहीं देखा। लक्ष्मी दीदी की शादी हो गई लेकिन मेरे प्रति उनका इतना प्यार रहता है कि वह ससुराल से ज्यादा मायके में ही रहती हैं और मेरी और मेरी मां-भाई की मदद करने के लिए हमेशा जान दिए रहती हैं। मेरे जीजा ओम प्रकाश जी भी हमारे लिए देवता की तरह हैं। बजरंगबली ने उन्हें जैसे हमारे लिए ही बनाया था। उन्हीं की छत्रछाया ने मुझे मेरा सपना पूरा करने में मदद की है।

मैंने इंटर किया, एलएलबी किया लेकिन खेलना मेरे लिए जुनून के समान ही था। मैंने आस-पास के जिलों में वॉलीबॉल-फुटबॉल खेला, कई पुरस्कार जीते, लेकिन मेरा जुनून बढ़ता ही गया। मैंने राष्ट्रीय स्तर पर भी खेलों में भाग लिया लेकिन मुझे मेरा हक नहीं मिला। मेरे पास हाथ-पैर थे, जुनून था लेकिन कोई सीढ़ी नहीं थी, कोई छत नहीं थी जो मुझे आगे बढ़ने देती, मुझे महफूज रखती।

मैंने सोचा कि कहीं पर नौकरी कर लूं ताकि उसी के साथ आगे बढ़ती जाऊं। कई जगह फार्म डाले। सीआईएसएफ में भी कोशिश की और एक दिन नोएडा में सीआईएसएफ के दफ्तर में जाने के लिए घर से निकल पड़ी, अकेली।
वह दिन था 11 अप्रैल 2011 का। मुझे नहीं मालूम था कि मेरी दुनिया बदलने जा रही है। पद्मावती एक्सप्रेस ट्रेन के चालू डिब्बे में खिड़की के किनारे एक सीट पर बैठी रात के अंधेरे में जुगनू जैसी किसी रोशनी की तलाश कर रही थी कि तभी कुछ 'लोफर टाइप' के लड़के आए और उन्होंने मेरे गले में पड़ी चेन पर झपट्टा मारा। मुझे हंसी आ गई। इन लड़कों की क्या औकात कि मुझसे मेरी चीज छीन लें? मैंने लड़के का हाथ पकड़कर मरोड़ दिया। लेकिन तभी दूसरे लड़के ने मेरे गले में हाथ डाला तो मेरे गरदन हटा लेने पर उसके हाथ में चेन की जगह मेरी शर्ट का कालर आ गया। उसने कालर पकड़कर घसीटा और दो-तीन लड़कों ने मुझे पकड़कर दरवाजे के पास खींच लिया।

मेरे लिए उनसे निबटना मुश्किल काम नहीं था लेकिन तभी लड़कों ने मेरे ऊपर ऐसी लात मारी कि मैं चलती ट्रेन से बाहर गिट्टियों के बीच लोटती सी नजर आई..। पता नहीं क्या हुआ, मुझे कुछ पता नहीं कि मेरे पैर के ऊपर से ट्रेन के कितने पहिए गुजरते चले गए। वे पहिए पद्मावत एक्सप्रेस के थे या दूसरी पटरी के ऊपर से गुजरने वाली ट्रेनों के? उस समय रात के डेढ़ बजे थे और ट्रेन बरेली के पास थी। लेकिन कुछ सोचने-समझने से पहले दर्द के आवेग ने मुझे बेसुध कर दिया।

बीच-बीच में मेरी तंद्रा टूटती तो देखती कि मैं ट्रेन की पटरियों के किनारे पड़ी हूं, मेरी एक टांग कट गई थी बस कुछ मांस भर ने उसे मेरे शरीर से जोड़े रखा था। बगल की पटरी से रह-रहकर ट्रेनें गुजर रही थीं। पटरी और मेरे बीच मात्र कुछ इंचों का ही फासला था। मैं अपने को पटरी से दूर करना चाहती थी लेकिन मेरे पास इतना दम कहां था, उस पर भीषण दर्द। मैं उस बीहड़ रात में उसी तरह पड़ी रही। जब मुझे होश आता तो बजरंगबली को याद करके यही कहती कि जय बजरंगबली..यह क्या हो रहा है मेरी जिंदगी के साथ..और अब क्या शेष रह गया है होने को? आंखों के सामने कभी मां की तस्वीर आती तो कभी भाई तो कभी लक्ष्मी दीदी की तो कभी जीजा की..।

पौ फटने पर जब लोग शौच के लिए रेलवे की पटरियों की तरफ आए तो मुझे पड़ा पाया। गांव वाले आए। मेरा नाम-पता पूछा। शायद आधी बेहोशी में मैंने घर का टेलीफोन नंबर बता दिया था। जीजा ने उनसे कहा कि इतनी मदद और कर दीजिए कि अरुणिमा को किसी अस्पताल तक पंहुचा दीजिए।

सुबह के सात बजे के करीब मुझे अस्पताल पंहुचाया गया। मेरी बाईं टांग काट दी गई। मीडिया द्वारा शोर मचाने पर मुझे लखनऊ के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया। वहां से फिर मुझे एम्स ले जाया गया। डाक्टरों ने मुझे बचा लिया। सीआईएसफ ने नौकरी देने की घोषणा की। तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने भी नौकरी देने की घोषणा की। तत्कालीन खेल मंत्री अजय माकन ने काफी राहतें दीं।

समाज को ये बातें हजम नहीं हुईं। इलाज के साथ ही विवाद भी शुरू हो गया कि मैं राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी नहीं हूं। मैंने इंटर भी पास नहीं किया है। मैं किसी के साथ भाग रही थी। मेरी शादी हो चुकी है। मैंने किसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया। मैं झूठी हूं, फरेबी हूं। यूपी के एडीजी रेल एके जैन ने तो बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके मुझे झूठा साबित किया और कहा कि मैंने ट्रेन से कूदकर आत्महत्या की कोशिश की थी या फिर मैं उस बीहड़ सुनसान इलाके में अकेले आधी रात को रेलवे लाइन पार कर रही थी, जब यह दुर्घटना घटी।

मैंने गुस्से में एके जैन को फोन लगाकर खूब सुनाया कि क्या आपका कोई सिपाही ट्रेन में मौजूद था जो बताता कि उस दिन ट्रेन में मुझे लूटने की कोशिश नहीं की गई थी? क्या रातभर पटरियों पर पड़े होने के बावजूद जीआरपी ने मेरी कोई मदद की? मन करता था कि मैं एके जैन के पास जाकर उनका मुंह नोच लूं।

एम्स में मेरी मां, मेरी बहन और जीजा ने मुझे समझाया कि और लड़कियों के साथ क्या-क्या नहीं होता, लोग तेजाब तक डाल देते हैं, तुम्हारा तो बस एक पैर ही गया है, अब आगे की योजना बनाओ। बहन की प्रेरणा ने मेरे मन में यह बात ला दी कि कुछ ऐसा करूं जिसे दुनिया देखे। क्यों न एवरेस्ट पर चढ़ जाऊं? बिना पैर के एवरेस्ट पर चढ़ना ही मुझे सबसे बेहतर विचार लगा। असली चुनौती यही है।

आसान काम तो हर कोई कर लेता है। मेरी मुश्किल को आसान कर दिया अमेरिका निवासी डॉ राकेश श्रीवास्तव और उनके भाई शैलेश श्रीवास्तव ने जो इनोवेटिव नाम से एक संस्था चलाते हैं। उन्होंने मेरे लिए एक कृत्रिम पैर बनवाया जिसको पहनकर मैं चलती हूं।

मुझे अजय माकन ने इतनी सहूलियतें दीं और वह भी तब, जब उत्तर प्रदेश की सरकार मुझे मुल्जिम बताने के लिए उतारू थी और मीडिया मेरे पीछे पड़ गया था। खिलाड़ियों का संगठन 'साई' भी मुझे खिलाड़ी नहीं मानता था। मैं चीख-चीख कर कहा करती थी कि "मैं जिंदा हूं, मुझसे आकर पूछो, मैं झूठी नहीं हूं।"

लेकिन मुसीबतों और परीक्षाओं का अंत अभी नहीं हुआ था। चार महीने एम्स में गुजारने के बाद जब मैं वापस लौटी तो मेरी बदनामी मेरा पीछा कर रही थी। मुझे विकलांगता का प्रमाण पत्र मिल गया था और रेल से पास भी। लेकिन मुझे ट्रेन के सेंकड क्लास की आरक्षित बोगी में चलने के लिए टिकट नहीं मिलता था। मुझे दौड़ाया जाता, शक किया जाता। मेरे लिए विकलांग बोगी में चलना भी अपमान के कड़वे घूंट पीने के समान ही था।

आरपीएफ के सिपाही मेरी टांग खुलवाकर देखते और फिर पास मांगकर उसकी जांच करते। एक बार तो हरिद्वार में जब मुझे टिकट नहीं मिला तो स्टेशन मास्टर ने बहुत मदद की। उन्होंने काउंटर क्लर्क से टिकट देने को कहा लेकिन उसने कहा कि उसे मेरे पास पर उसे शक है। उसमें हस्ताक्षर ठीक नहीं हैं। अंत में स्टेशन मास्टर ने अपने दम पर मुझे जबरदस्ती ट्रेन में बैठाया।

ममता बनर्जी ने नौकरी देने की घोषणा की थी। जब मैं कृत्रिम टांगों से चलकर रेल मंत्रालय पंहुची तो उनके पीए ने मिलाने से मना कर दिया। तीन बार निराश होकर मैं लौट आई। रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष विवेक सहाय से मिलने में मैं किसी तरह कामयाब हो गई तो उनका जवाब सुनकर हैरत हुई। उन्होंने सारे कागजात देखे और फिर कहा कि पहले जीआरपी से बढ़िया सी रिपोर्ट लगवाकर लाओ। ये थी रेलवे के मंत्री और अध्यक्ष की मानवीयता।

मैंने हिम्मत नहीं हारी। कहा कि इन सबको अपनी ताकत दिखाऊंगी, ये सब मुझे पहचानेंगे और खुद चलकर मेरे पास आएंगे। मुझे बछेंद्री पाल ने काफी प्रोत्साहित किया। उन्हीं के प्रशिक्षण की बदौलत मैं आज आसमान के इतने करीब हूं। मैं माउंट एवरेस्ट की चोटी पर हूं जहां पर हर कोई नहीं पंहुच पाता है। ऐसा लगता है कि बस हाथ उठाऊं और छू लूं।

मुझे बुखार आ गया। और नीचे भी लौटना था उस दुनिया में जो नहीं चाहती थी कि मैं यहां तक पहुंचूं। लेकिन कुछ लोग थे जिनका मेरे पर विश्वास था और उन्हीं के भरोसे मैं यहां तक पहुंची हूं। मेरी इच्छा अपने जैसे विकलांग लोगों की मदद करने की है, जिन्हें समाज ठुकराता है। मैं चाहती हूं कि उनके लिए कोई खेल अकादमी बनाऊं, उन्नाव में साढ़े सात बीघा जमीन मिल गई है। साढ़े तीन बीघा और खरीदनी है।

इस अकादमी से जब मेरी जैसी ऊंची चाहत रखने वाले निकलेंगे तब मुझे लगेगा कि मेरे साथ जो कुछ हुआ वह सब ठीक था क्योंकि अगर ये सब न होता तो आने वाली पीढ़ी को हौसला कौन दे पाता..! अगले महीने की 10 तारीख को मैं 27 वर्ष की हो जाऊंगी। मुझमें अभी बहुत सी ऊंचाइयों को छूने का हौसला बाकी है। बस, मुझे कोई चुनौती दे दीजिए..!"
dil se...news

Wednesday, December 10, 2014

गौरव और शर्म के पल साथ—साथ


दिनांक:10 दिसंबर,दिन:बुधवार,हमारे प्यारे मध्यप्रदेश के लिए एक महान गौरव का दिन है। चाहे हम लाख बुराई विदे​शी पुरस्कारों की करें या उनको शंका या साजिश की निगाहों से देखें लेकिन नोबल पुरस्कार अपने आप में मायने रखता है। यह एक तरह से दुनिया की ओर से स्वीकारोक्ति है कि भारत कुछ कर रहा है। निसंदेह हम विकसित देशों की श्रेणी में आज भी काफी पीछे हैं लेकिन सेवा में हम किसी से पीछे नहीं है। एशियाई देशों में यदि चाईल्ड लेबर या बालश्रम एक बडी बीमारी है तो यह सत्य भी उजागर हुआ है कि हमारे यहां कैलाश सत्यार्थी सरीखे लोग भी है जो इस बचपन को बचाने में अपना खून—पसीना एक किए हुए हैं। इसके साथ ही हमारे राजनैतिक दुश्मन लेकिन सांस्कृतिक दोस्त पाकिस्तान की मलाला युसफजई को भी नोबेल पुरस्कार साथ ​में मिलना बताता है कि हमारी समस्याएं भी साझीं हैं और समाधान भी साझे हैं। इन दोनों का सम्मान सच माने में भारत और पाक के आम लोगों को सम्मान है। आखिर ये किसी सरकारी मदद या राजनैतिक सेटिंग से पुरस्कार तक नहीं पहुंचे हैं इसलिए ये सत्य और संघर्ष का भी सम्मान है।हमें गौरव है कि कैलाश जी हमारे प्रदेश के विदिशा के ही हैं। ये अलग बात है कि न तो जिले के प्रशासन ने और न ही सेवा का दम भरने वाले सरकारी शासन ने उनके इस संघर्ष को सलाम किया,सम्मान दिया।

हालांकि यह अच्छा भी हुआ क्योंकि इन नेताओं की यहां तक की मंत्रियों की सोच,अक्ल,जानकारी कितनी सीमित है इसका पता कल विधानसभा सत्र के दौरान ही चल गया। जब मीडिया ने इनसे कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलने पर उनकी प्रतिक्रिया जानी तो किसी ने कैलाश विजवर्गीय को बधाई दे डाली तो किसी ने श्री सत्यार्थी को किसी राजनैतिक दल का मान लिया। इनकी सोच से स्पष्ट है कि इन्हें सिवाए राजनीति के कुछ नहीं आता। अब आप समझ गए होंगे कि जब नीति—निर्धारण करने वाले ही इतने गए—गुजरे हैं तो प्रदेश और देश का क्या होगा। इनमें इन बेचारों की गलती भी नहीं है आखिर हम ही इन सभी को चुनते हैं तो फिर इनको क्या दोष देना।






प्रिय साथियों
      
  बहुत समय से लेखन से दूर रहा। कुछ सामाजिक गतिविधियों में इस तरह उलझा रहा कि लिखने का समय कम ही मिल पाया। पहले सोचता था और कुछ कमेंटस भी करते थे कि लिखना और आलोचना करना आसान है,कुछ करके दिखाओ तो कुछ सा​र्थक करने की कोशिश की। लेकिन अब सोचता हूं कि करने के साथ—साथ अपने मूल धर्म लेखन को परे रखना गलत है। आखिर लेखन ही तो मेरी आत्मा है और पाठक ही परमात्मा है। इसलिए अब खूब लिखुंगा,जो करूंगा दिन भर वो लिखुंगा,जो सोचूंगा दिन भर वो लिखुंगा। लेकिन अब आपको निराश नहीं होने दूंगा।
                                                                                                                                                
                                                                                                                                                धन्यवाद