दिनांक:10 दिसंबर,दिन:बुधवार,हमारे प्यारे मध्यप्रदेश के लिए एक महान गौरव का दिन है। चाहे हम लाख बुराई विदेशी पुरस्कारों की करें या उनको शंका या साजिश की निगाहों से देखें लेकिन नोबल पुरस्कार अपने आप में मायने रखता है। यह एक तरह से दुनिया की ओर से स्वीकारोक्ति है कि भारत कुछ कर रहा है। निसंदेह हम विकसित देशों की श्रेणी में आज भी काफी पीछे हैं लेकिन सेवा में हम किसी से पीछे नहीं है। एशियाई देशों में यदि चाईल्ड लेबर या बालश्रम एक बडी बीमारी है तो यह सत्य भी उजागर हुआ है कि हमारे यहां कैलाश सत्यार्थी सरीखे लोग भी है जो इस बचपन को बचाने में अपना खून—पसीना एक किए हुए हैं। इसके साथ ही हमारे राजनैतिक दुश्मन लेकिन सांस्कृतिक दोस्त पाकिस्तान की मलाला युसफजई को भी नोबेल पुरस्कार साथ में मिलना बताता है कि हमारी समस्याएं भी साझीं हैं और समाधान भी साझे हैं। इन दोनों का सम्मान सच माने में भारत और पाक के आम लोगों को सम्मान है। आखिर ये किसी सरकारी मदद या राजनैतिक सेटिंग से पुरस्कार तक नहीं पहुंचे हैं इसलिए ये सत्य और संघर्ष का भी सम्मान है।हमें गौरव है कि कैलाश जी हमारे प्रदेश के विदिशा के ही हैं। ये अलग बात है कि न तो जिले के प्रशासन ने और न ही सेवा का दम भरने वाले सरकारी शासन ने उनके इस संघर्ष को सलाम किया,सम्मान दिया।
हालांकि यह अच्छा भी हुआ क्योंकि इन नेताओं की यहां तक की मंत्रियों की सोच,अक्ल,जानकारी कितनी सीमित है इसका पता कल विधानसभा सत्र के दौरान ही चल गया। जब मीडिया ने इनसे कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलने पर उनकी प्रतिक्रिया जानी तो किसी ने कैलाश विजवर्गीय को बधाई दे डाली तो किसी ने श्री सत्यार्थी को किसी राजनैतिक दल का मान लिया। इनकी सोच से स्पष्ट है कि इन्हें सिवाए राजनीति के कुछ नहीं आता। अब आप समझ गए होंगे कि जब नीति—निर्धारण करने वाले ही इतने गए—गुजरे हैं तो प्रदेश और देश का क्या होगा। इनमें इन बेचारों की गलती भी नहीं है आखिर हम ही इन सभी को चुनते हैं तो फिर इनको क्या दोष देना।


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